अगर मालवा। मौसम की मार… उत्पादन की भरमार… और बाजार में फूलों के गिरते दाम! जिस गेंदा और गुलाब की खेती किसानों की कमाई का जरिया बननी थी, वही अब उनके लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। मध्य प्रदेश के आगर-मालवा में फूल उत्पादकों पर दोहरी नहीं, बल्कि तिहरी मार पड़ रही है।
तापमान बढ़ने से फूल समय से पहले खिल गए, उत्पादन बढ़ने से मंडियों में फूलों की आवक बढ़ गई और दूसरी ओर बड़े शहरों में मांग कमजोर पड़ने से कीमतें औंधे मुंह गिर गईं। हालात ऐसे हैं कि किसान फूलों की खेती में हजारों रुपए लगाने के बाद भी अपनी लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गेंदा दो से पांच रुपए किलो तक बिक रहा है, जबकि अच्छी क्वालिटी के गुलाब के दाम भी 30 से 40 रुपए किलो तक सिमट गए हैं। फूलों की खुशबू के बीच किसानों की मेहनत और उम्मीदों पर आर्थिक संकट का साया छा गया है।

आगर-मालवा में फूलों की खेती करने वाले किसानों के लिए इस बार बाजार के हालात किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। खेतों में फूल खिले हैं, फसल तैयार है और मंडियों तक फूल पहुंच भी रहे हैं, लेकिन किसानों को उनकी मेहनत के मुताबिक कीमत नहीं मिल रही। थोक मंडी में रोजाना करीब दस टन फूल पहुंचने की बात सामने आ रही है। आवक ज्यादा होने और मांग कमजोर रहने से फूलों के दाम लगातार दबाव में हैं। सबसे खराब स्थिति गेंदा उत्पादकों की है, जिन्हें एक किलो फूल के बदले महज दो से पांच रुपए तक मिल रहे हैं।
किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लागत निकालने की है। एक बीघा जमीन में गेंदा की फसल तैयार करने पर करीब 25 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। इसमें पौधों की तैयारी, खाद, दवा, सिंचाई, मजदूरी और फूलों की तुड़ाई जैसे खर्च शामिल हैं। इसके बाद फूलों को मंडी तक पहुंचाने में भी पैसा खर्च होता है। लेकिन जब तैयार फसल बेचने की बारी आती है, तो कीमत इतनी कम मिलती है कि किसान अपनी मेहनत का उचित मूल्य तो दूर, कई बार लागत का हिसाब भी नहीं लगा पाते।
हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब दस किलो फूलों की पोटली बेचने पर किसान के हाथ में सिर्फ 30 से 40 रुपए आ रहे हैं। फूलों को तोड़ने, उनकी पोटली बनाने और मंडी तक पहुंचाने में लगी मेहनत के मुकाबले यह रकम बेहद कम है। किसानों के लिए अब फूलों की खेती मुनाफे की जगह आर्थिक बोझ बनती जा रही है। परिवहन और दूसरे खर्च निकालने के बाद उनकी कमाई और भी कम हो जाती है।
गेंदा ही नहीं, गुलाब की खेती करने वाले किसान भी बाजार की बेरुखी से परेशान हैं। अच्छी क्वालिटी के गुलाब के दाम भी 30 से 40 रुपए किलो तक सीमित हैं। फूलों की कीमतों में आई इस गिरावट के पीछे मौसम और बाजार, दोनों की भूमिका सामने आ रही है। तापमान बढ़ने से फूल समय से पहले खिल गए। इससे एक साथ ज्यादा फूल तैयार हुए और बाजार में आवक बढ़ गई। वहीं, बड़े शहरों की मंडियों में मांग कमजोर रहने से उत्पादकों को अपनी उपज के अच्छे दाम नहीं मिल पा रहे हैं।
किसान पर्वत सिंह यादव का कहना है कि फूलों की खेती में मेहनत और लागत दोनों ज्यादा हैं, लेकिन बाजार में उचित भाव नहीं मिलने से पूरी गणित बिगड़ गई है। फसल तैयार होने के बाद फूलों को ज्यादा समय तक रोककर रखना भी आसान नहीं होता। फूल जल्दी खराब होने वाली उपज हैं, इसलिए किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर भी उन्हें बेचना पड़ता है। ऐसे में बाजार में भाव गिरने का सीधा असर उनकी आमदनी पर पड़ रहा है।
कुल मिलाकर आगर-मालवा में फूलों की खेती करने वाले किसान इस समय मौसम की अनिश्चितता, जरूरत से ज्यादा उत्पादन और कमजोर बाजार मांग के बीच फंसे हुए हैं। खेतों में खिलते फूल भले ही खूबसूरत नजर आ रहे हों, लेकिन उन्हें उगाने वाले किसानों के चेहरे मुरझाए हुए हैं। जरूरत इस बात की है कि फूल उत्पादकों को बाजार की मांग के मुताबिक उत्पादन की जानकारी, बेहतर विपणन व्यवस्था और उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके, ताकि फूलों की खेती किसानों के लिए घाटे का नहीं, बल्कि मुनाफे का सौदा बन सके।
